• निर्दोषों को किसने बनाया बलि का बकरा

    देश के प्रतिष्ठित जामिया विश्वविद्यालय में भी सीएए का विरोध कई छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे थे। इस विरोध का दमन करने की कोशिश दिल्ली पुलिस ने की

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    दिल्ली की साकेत कोर्ट ने दिसंबर 2019 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया केंद्रीय विश्वविद्यालय के नज़दीक हुई हिंसा के मामले में शरजील इमाम, सफूरा जरगर, आसिफ इकबाल तन्हा, मो. अबुजर, उमैर अहमद, मो. शोएब, महमूद अनवर, मो. कासिम, मो. बिलाल नदीम, शहजर रजा खान और चंदा यादव कुल 11 लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया है। गौरतलब है कि 2019 के आखिरी महीनों में देश में मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ नाराजगी फैलनी शुरु हो गई थी।

    देश के प्रतिष्ठित जामिया विश्वविद्यालय में भी सीएए का विरोध कई छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे थे। इस विरोध का दमन करने की कोशिश दिल्ली पुलिस ने की। जिसके बाद हिंसा भड़क गई थी। इसी मामले में दिल्ली पुलिस ने कुछ लोगों को आरोपी बनाते हुए गिरफ्तार किया था, जिन्हें अब तीन साल बाद अदालत से ससम्मान रिहाई मिल गई है। रिहाई के इस आदेश के साथ अदालत ने जो टिप्पणियां की, वे काफी महत्वपूर्ण हैं। इस मामले के आऱोप पत्र और तीन पूरक आरोप पत्रों को देखने के बाद अदालत ने तथ्यों की कमियां गिनाते हुए कहा कि पुलिस अपराध को अंजाम देने वाले असली अपराधियों को पकड़ने में नाकाम रही लेकिन इन लोगों को बलि के बकरे के तौर पर गिरफ्तार करने में कामयाब रही।

    अदालत की इस टिप्पणी को सुनकर अंधेर नगरी चौपट राजा का नाटक ध्यान आ जाता है, जिसमें फरियादी को न्याय की जगह न्याय का तमाशा देखने मिलता है। साकेत अदालत के अतिरिक्त सेशन जज अरुल वर्मा ने बलि का बकरा वाली टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की पुलिस कार्रवाई ऐसे नागरिकों की आज़ादी को चोट पहुंचाती है जो अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जुटते हैं। जज वर्मा ने कहा कि ये बताना ज़रूरी है कि असहमति और कुछ नहीं बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में निहित प्रतिबंधों के अधीन भाषण देने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अमूल्य मौलिक अधिकार का विस्तार है। ये एक ऐसा अधिकार है जिसे बरकरार रखने की हमने शपथ ले रखी है। ये हमारा फ़ज़र् बन जाता है कि हम ऐसी किसी बात को मानने से इनकार करें जो हमारी अंतरात्मा के खिलाफ़ है। जज वर्मा ने देश के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की उस हालिया टिप्पणी का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सवाल करने और असहमतियों के लिए जगह ख़त्म करना राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तरक्की के आधार को ख़त्म करना है। इस लिहाज़ से असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है।

    अदालत के ये कथन लोकतंत्र में असहमति का महत्व तो रेखांकित करते ही हैं, साथ ही पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कितनी गंभीर बात है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिन लोगों पर जनता की रक्षा की जिम्मेदारी है, कानून व्यवस्था बनाए रखने का महती भार है, वो निर्दोष लोगों को बलि का बकरा बनाएं। अगर ऐसा चलन कायम रहेगा, तो हाशिए के लोगों के अधिकारों पर हमेशा खतरा बना रहेगा। अदालत ने जिन लोगों को आरोपों से मुक्त किया है, उन 11 लोगों के नामों पर गौर किया जाए, तो समझ आएगा कि पुलिस प्रशासन किस कदर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर काम करता है।

    जामिया मामले में दिल्ली पुलिस ने जो मामला तैयार किया था, वह ताश के महल की तरह था, जिसमें कोई चीज पुख्ता नहीं थी। अदालत ने जो 32 पन्नों का आदेश दिया है, उसमें एक तरह से दिल्ली पुलिस की कार्यशैली की धज्जियां उड़ा दी हैं। आरोपपत्र में तथ्यों की कमियां होने के साथ-साथ तीसरे पूरक आरोपपत्र की शुरुआत ही गलतबयानी से होती है, इस ओर अदालत ने ध्यान दिलाया। अदालत ने कहा कि पुलिस ने गवाहों से आरोपी की फोटो के जरिए पहचान कराने में तीन साल लगा दिए। दो को छोड़कर बाकी सभी पुलिस के गवाह हैं जिससे केस 'संदिग्ध' हो जाता है।

    विचारणीय है कि जिस मामले में आरोप पत्र पुलिस ठीक तरह से तैयार न कर सके, उसके लिए 11 निर्दोष लोगों को अपने जीवन के महत्वपूर्ण साल जेल में बिताने पड़े। अभी 1 फरवरी को केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन भी इसी तरह जमानत पर रिहा हुए, जो अक्टूबर 2020 से गिरफ्तार किए गए थे। उन्हें जमानत मिलने के बावजूद रिहाई में देरी हुई, क्योंकि आदेश समय पर न पहुंचा था। आश्चर्य की बात है कि जिस जमाने में दुनिया के एक कोने की खबर दूसरे कोने तक पहुंचने में एक सेंकंड नहीं लगता, वहां एक देश में, एक राज्य में आदेश समय पर न मिलने का कारण किसी की रिहाई में बाधक हो सकता है।

    सिद्दीक कप्पन भी हाथरस मामले में असलियत जानने और उस खबर को लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से जा रहे थे कि पुलिस ने उन्हें शांति भंग करने समेत कई अन्य कारणों से गिरफ्तार कर लिया। शरजील इमाम, उमर खालिद और उनके जैसे कई लोग इसी वजह से सलाखों के पीछे हैं कि पुलिस के मुताबिक ये लोग देश को अस्थिर करने और लोगों को भड़काने का काम कर रहे थे। ऐसे नापाक इरादे किसी भी शख्स के हों, उस पर फौरन कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इसके पीछे पुख्ता सबूत भी तो होने चाहिए। केवल किसी की जाति, धर्म या विचारधारा के हिसाब से पुलिस कार्रवाई का पैमाना तय करे, तो यह बड़ी गंभीर स्थिति होगी।

    हाल ही में एक वीडियो सामने आया है, जिसमें योग शिक्षक और व्यापारी रामदेव मुस्लिम समुदाय के लिए अनर्गल टिप्पणियां कर रहे हैं। क्या इस वीडियो की सत्यता की परख नहीं होनी चाहिए और अगर यह ठीक है, तो क्या रामदेव पर कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। देश में पिछले दिनों हुई धर्मसंसदों, कई तथाकथित सत्संगों में स्वघोषित धर्मगुरुओं ने इसी तरह की टिप्पणियों से सामाजिक सौहार्द्र को बिगाड़ने का काम किया, जिसका तात्कालिक असर भले नजर न आए, लेकिन देश की बुनियाद पर आघात तो हुआ ही है, क्या ये सब भी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शुमार नहीं होना चाहिए।

    जामिया मामले में देर से ही सही लेकिन इंसाफ हुआ है। पर यह इंसाफ मुकम्मल तभी होगा, जब आरोपी बना दिए गए संभावनाशील युवाओं का भविष्य सुरक्षित बन पाएगा। जब इस कानूनी कार्रवाई के कारण समाज उन्हें भेद भरी नजरों से नहीं देखेगा। और सबसे बढ़कर इंसाफ तब पूरा माना जाएगा, जब निर्दोषों को बलि का बकरा बनाने वाले पुलिसकर्मियों पर मामला चलेगा। अगर पुलिस के निचले स्तर के कर्मियों ने यह कदम उठाया, तो किसके आदेश पर ऐसा किया और पुलिस को राजनैतिक मकसद के लिए प्यादों की तरह किसने इस्तेमाल किया, इन बातों का खुलासा भी होना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार तभी सुरक्षित रह पाएगा।

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